अभियंताओं ने जताया आक्रोश , आंदोलन की चेतावनी
लखनऊ।।विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के केंद्रीय पदाधिकारियों ने पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन द्वारा क्षतिग्रस्त ट्रांसफार्मरों की मरम्मत के खर्च की वसूली अभियंताओं एवं अवर अभियंताओं के वेतन से करने के आदेश पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। संघर्ष समिति ने इसे अन्यायपूर्ण, अव्यावहारिक एवं दमनकारी कदम बताते हुए तत्काल वापस लेने की मांग की है।
संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन प्रदेश में बिजली वितरण कंपनियों के निजीकरण का रास्ता साफ करने के लिए सुनियोजित तरीके से बिजली कर्मियों और अभियंताओं का उत्पीड़न कर रहा है। यह आदेश उसी कड़ी का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य कर्मचारियों में भय का माहौल बनाना है।
संघर्ष समिति ने कहा कि ट्रांसफार्मरों के क्षतिग्रस्त होने के अनेक तकनीकी कारण होते हैं, जिनमें ओवरलोडिंग प्रमुख है। ओवरलोडिंग की जिम्मेदारी शीर्ष प्रबंधन की होती है, क्योंकि पर्याप्त क्षमता के ट्रांसफार्मर उपलब्ध कराना और लोड प्रबंधन करना उसी के दायरे में आता है। बिना किसी तकनीकी जांच के सामान्य आदेश के माध्यम से अभियंताओं पर आर्थिक दंड थोपना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
उन्होंने यह भी कहा कि सेवा नियमावली में लापरवाही सिद्ध होने की स्थिति में अनुशासनात्मक कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान है, जिसमें लघु एवं वृहद दंड शामिल हैं, लेकिन वेतन से मरम्मत खर्च की वसूली का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे में यह आदेश पूरी तरह असंवैधानिक, मनमाना और तानाशाहीपूर्ण है।
संघर्ष समिति ने कहा कि अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में निजी नलकूपों पर ट्रांसफार्मर ओवरलोड हो रहे हैं और उनके उच्चीकृत करने का बिजनेस प्लान में कोई प्राविधान नहीं है। ऐसे में अभियंताओं के वेतन से रिकवरी का आदेश डर और दमन का वातावरण बनाने के लिए किया गया है।
संघर्ष समिति ने यह भी आरोप लगाया कि शीर्ष प्रबंधन द्वारा वर्टिकल रीस्ट्रक्चरिंग के नाम पर विशेषकर लखनऊ सहित कई शहरों में बिजली व्यवस्था को अव्यवस्थित कर दिया गया है। अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए अब शीर्ष प्रबंधन पूरा दोष कर्मचारियों और अभियंताओं पर मढ़ना चाहता है। संघर्ष समिति ने स्पष्ट चेतावनी दी कि इस प्रकार के दमन और उत्पीड़न के बावजूद बिजली कर्मी निजीकरण के खिलाफ अपना आंदोलन जारी रखेंगे।




